मन बड़ा विचित्र है,
ना जाने, ये क्या-क्या सोचता रहता है,
किस पल ये क्या करवा दे,
कुछ नही कहा जा सकता,
ना जाने, ये क्या-क्या सोचता रहता है,
किस पल ये क्या करवा दे,
कुछ नही कहा जा सकता,
मन पर कोई बिरला ही लगाम लगा पाता है,
अभी मन कैसा, अगले पल कैसा हो जाए,
यह समझ पाना अत्यंत कठिन है,
जिसने मन को जीता, उसने जग जीता,
मन के कारण ही,
कभी इंसान सफल होता है,
कभी विफल होता है l
मन जैसा मित्र भी कोई नही,
और मन जैसा शत्रु भी कोई नही,
जिसने मन पर एतबार किया,
उसने धोख़ा खाया,
जिसने मन को समझ लिया,
जिसने मन को समझा लिया,
वह मन से सही काम ले सकता है,
मन सूक्ष्म है, मन व्यापक है,
मन अंदर है, पर बाहर घूमता है
मन एक दर्पण है,
मन की हजारों आँखें है,
मन एक कम्प्यूटर है,
मन एक मशीन है,
जो दिन-रात चलती रहती है,
मन की प्रकृति को,
समझना अति आवश्यक है l
मन अगर दुनियाँ में लग जाए,
तो दुनियाँ के बारे में निरंतर सोचता है,
मन अगर घर में लग जाए तो
घर के बारे में सोचता है,
मन अगर ऑफिस में लग जाए तो
ऑफिस के बारे में सोचता है,
मन को जहाँ लगाया जाए,
उसी के बारे में सोचता है,
सबसे उत्तम है,
तो दुनियाँ के बारे में निरंतर सोचता है,
मन अगर घर में लग जाए तो
घर के बारे में सोचता है,
मन अगर ऑफिस में लग जाए तो
ऑफिस के बारे में सोचता है,
मन को जहाँ लगाया जाए,
उसी के बारे में सोचता है,
सबसे उत्तम है,
मन को हरि-भजन में लगाया जाए,
मन को हरि चर्चा में लगाया जाए,
मन को हरि गुणगान में लगाया जाए l
मन को हरि चर्चा में लगाया जाए,
मन को हरि गुणगान में लगाया जाए l
Thank You.
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