दुनियाँ

क्यों मैं दुनियाँ में अकेला पड़ जाता हूँ, 
सब साथ होते हैं मगर फिर भी अकेला रह जाता हूँ, 
मेरी उपेक्षाएँ ही मुझे दुखी करती है, 
मेरी अपेक्षाएँ ही मुझे और दुखी करती है, 
क्यों मैं जिंदगी को, अब तक नही समझ पाया हूँ l

हर कोई जहान में अपनी धुन में जीता है, 
मगर लोग दूसरों की जिंदगी में दखल क्यों देते हैं, 
झूठ के साथ जीना पसंद है दुनियाँ को, 
सच्चाई को क्यों अपने दिल में छुपा लेते हैं, 
क्यों नही मैं अपने आप को पहचान पाया हूँ  l

लोग क्यों परेशान रहते हैं इस दुनियाँ में, 
एक-दूसरे की भावनाओं जब समझ नही पाते हैं, 
छूटती आदत नही जब, औरों का दिल दुखाने की, 
दूसरों को दुख देकर, कौन सुखी रह पाया है, 
चैन का एक पल भी, मेरे लिए काफी है, 
वरना ये जिंदगी तो, भागी-दौड़ी फिरती है, 
मुस्कुराहटें चेहरे पर आ जाए अब तो, 
दुनियाँ के शोर-शराबे से कुछ दूर चला आया हूँ  l


Thank You. 

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