कैसे बीत जाता है दिन
कैसे बीत जाता है दिन,
पता नही, कैसे चलता है ये जीवन,
सुबह से लेकर शाम तलक,
अजीब सा होता है ये जीवन ।
क्या काम करने लगते हैं,
क्या काम करने चाहिए,
जो काम मिले वही करना पड़ता,
औरों की मर्जी में जीना पड़ता,
घर से निकलते काम की खातिर,
काम में बीत जाता है दिन,
दिन भर चुनौतियों से
दिन भर चुनौतियों से
होता रहता है सामना ।
कभी ये करो, क़भी वो करो,
औरो की मर्जी से सब करो,
क्या किया और क्या मिला,
क्या किया और क्या मिला,
सब भूल गया, नही याद रहा,
इस गर्मी के मौसम में,
चलना-फिरना कुछ ज्यादा हुआ ।
कभी मन थकता,
कभी तन थकता,
ऐसे ही ये जीवन चलता रहता,
कभी तन थकता,
ऐसे ही ये जीवन चलता रहता,
हर रोज के सफर में,
तन-मन भी कुछ उकता लगता ।
मंजिल किसको क्या मिलती है,
किसके दुख दूर यहाँ होते हैं,
मेहनत तो करते हैं सभी,
पर किसके जीवन में खुशियाँ भरती है,
इस जीवन की यही कहानी,
ये तो बस आगे बढ़ता रहता।
Thank You.
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