अपने मन को मैं बिखेरना नही चाहता हूँ
अपने मन को मैं बिखेरना नही चाहता हूँ,
मैं चाहता हूँ कि मेरा मन एकत्रित रहे,
एक जगह शिथिर रहे, यह ईधर उधर की ना सोचे,
बल्कि एक लय में परमात्मा का मनन करे,
मैं चाहता हूँ कि मैं अपने मन को बेहद खास बनाऊँ ।
मेरा मन नित्य श्रवण करे, उस अनहद नाद का,
जिसकी गूँज निरंतर संपूर्ण ब्रह्मांड में गूंजती रहती है,
जो मुझे हर प्रकार की चिंता से दूर करती है,
और मुझे परमात्मा के नाम से जोड़ती है,
परमात्मा के ध्यान से जोड़ती है,
मैं चाहता हूँ कि मेरा मन शांत रहे ।
बेवजह की बातों में मन ना लगे
बल्कि नैसर्गिक धुन में मस्त रहे,
छोड़ दे मन अपनी झूठी जिद्द को,
छोड़ दे मन अपने झूठे अहंकार को,
मैं चाहता हूँ, यह जीवन परमात्मा को समर्पित हो ।
Thank You.
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