सत्य क्या है,
एक वह परमात्मा ही सत्य है,
बाकी सब जगत् मिथ्या,
क्योकिं इस संसार मे,
सब कुछ खत्म हो जाता है,
लेकिन कुछ ऐसा तो बचता है,
जो कभी समाप्त नही होता है,
शरीर खत्म हो जाते हैं
लेकिन बीज नष्ट नही होता है,
और यह संसार चलता रहता है,
जीवों की मृत्यु होती रहती है,
और संसार में नए जीव जन्म लेते हैं,
और यह संसार-चक्र चलता रहता है,
जैसे शरीर नए वस्त्र धारण करता है,
ऐसे ही आत्मा नया शरीर धारण करती है,
अर्थात् नया जन्म लेती है,
जैसे शरीर पुराने वस्त्रों का त्याग करती है,
ऐसे ही आत्मा शरीर का त्याग करती है,
जिसे मृत्यु कहते है,
ये शरीर तो एक वस्त्र के समान है,
आत्मा ना तो कभी जन्म लेती है,
ना कभी मरती है,
यह तो शरीर को धारण करती रहती है,
और शरीर का त्याग करती रहती है,
आत्मा सदचिदानंदघन स्वरूप है,
यह आत्मा और परमात्मा कोई अलग नही है,
एक ही है,
ये आत्मा तो एक सागर की बूँद के समान है,
जो परमात्मा में मिलकर परमात्मा हो जाती है,
परमात्मा आकाश स्वरूप है,
जो अनंत है, सदैव है सर्वत्र है,
जो सत्य स्वरूप है,
चेतन स्वरूप है,
आनंद स्वरूप है,
प्रकाश स्वरूप है,
वह एक होते हुए भी अनेक है,
और अनेक होते हुए भी एक है,
जिसकी लीलाओं का कोई अंत नही है,
जो साकार भी है निराकार भी है,
उसके बारे में जितनी चर्चा की जाए,
उतना कम है,
बड़े-बड़े पंडित, मुनिजन, साधुसंत,
देव, यक्ष, गंधर्व आदि उसकी लीलाओं का अंत नही पाते है,
उस सत्यस्वरूप परमपिता परमात्मा को कोटि-कोटि नमन l
Thank You.
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