कुछ चाह जगी, कुछ चाह मिटी

कुछ चाह जगी, कुछ चाह मिटी,
ये मनवा बेपरवाह हुआ,
कुछ भूला, कुछ याद रहा,
जैसे जीवन पे उपकार हुआ ।

कुछ सोचा था, कुछ हो गया,
कुछ चाहा था, जो नही हुआ,
कुछ खुशियों का संचार हुआ,
कुछ सोच लिया, कुछ पाने को,
कुछ मिल गया, फ़िर गंवाने को,
कुछ अहंकार जो कम हुआ,
तो जीवन शानदार हुआ ।

जब लग्न लगीं उस ईश्वर से,
तो मुझपे बहुत उपकार हुआ,
जो हुआ, अपने आप हुआ,
जैसे मेरा कुछ भी नहीं प्रयास हुआ,
कुछ खास बना है ये जीवन,
जैसे रब का दीदार हुआ ।



Thank You.

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