जैसे कोरे कागज पर लिखता हूँ कुछ अक्षर




जैसे कोरे कागज पर लिखता हूँ कुछ अक्षर, 
ऐसे मन के कागज पर लिखता हूँ कुछ अक्षर, 
मन तो है किताब मेरी, जिसे जब चाहे पढ़ लेता हूँ, 
मन में है लाखों कहानियाँ, 
जिनसे मनोरंजन अपना कर लेता हूँ, 
जो सोचूँ वह लिखता जाता हुँ,
जो बोलूँ वह लिखता जाता हूँ,
ऐसे दिल की तख्ती पर लिखता हूँ कुछ अक्षर l

जीवन तो सुंदर कविता, कभी-कभी गा लेता हूँ, 
ये तो खुशियों से भरी है, कभी-कभी गुनगुना लेता हुँ, 
चाहतों से भरा ये जीवन, इसमें आशाएँ भी पूरी होती है, 
हँसी-खुशी का है ये जीवन, इसमें मुरादें भी पूरी होती है, 
कभी हूँ लिखता, कभी मिटाता, कुछ सोचता हूँ अक्षर l

वह एक शब्द, एक अक्षर, जिसका विनाश नही होता है, 
एक नाम, जिसमें सब ज्ञान, जिसका अंत कभी नही होता है, 
उस गोविंद को अपना कहता हूँ, उस ईश्वर को सत्य कहता हूँ,
हरदम है जो सदा रहेगा, सत्य-स्वरूप वह अक्षर l


Thank You. 



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