चंचल मन कुछ कहता जाये

चंचल मन कुछ कहता जाये,
सोच-सोचकर, कुछ भी चाहे,
क्या मिलता है जग में,
इस व्याकुल इस मन को,
जो ये अपना चैन गंवाए ।

दुनियाँ की चाहत कुछ ऐसी,
जो हरदम दुनियाँ के बारे में सोचे,
खुद चाहे, कितना भी परेशान हो ये,
और क्या करते हैं, ये तो देखे,
रह नही पाता, आज में ये तो,
कल-परसों-बरसों के चक्र लगाए ।

क्या पाना है, यहाँ क्या खोना है,
क्या मिलना है, क्या जाना है,
उलझा फिरता है, ये तो जग में,
ये तो हरदम, उम्मीद जगाए ।


Thank You.

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