रे मन, तू चिंताएँ, कब छोड़ेगा
रे मन, तू चिंताएँ, कब छोड़ेगा,
रे मन, तू खुद को रब से, कब जोड़ेगा,
इस दुनियाँ के बंधनों में तू बंधा हुआ है,
दुनियाँ की फिक्र में, तू लगा हुआ है,
रे मन, तू परेशानी, कब छोड़ेगा l
तू क्या चाहे, इस दुनियाँ से,
तू क्या देखे, इस दुनियाँ में,
ये दुनियाँ तो है, काँटों का जंगल,
जहाँ उलझकर कर गिर जाना है,
जहाँ ढूँढता चैन तू पाना,
वहीं बैचन तुझे हो जाना है,
रे मन, तू बेचैनी, कब छोड़ेगा l
ईश्वर से तू प्रीत लगा ले,
ईश्वर के तू नित्य गुण गा ले,
इस जग से तुझे क्या मिलेगा,
जिसकी चाहत में तू उलझा रे,
अमन, तू कब तक,
जग से आशाएँ रखेगा l
Thank You.

Comments